Monday, October 23, 2017

ढिबरा चुनने छोड़ मगदल्नी किंडों ने खोला जनरल दुकान

शहरों की तरह गाँव की महिलाएँ भी स्वरोजगार करना चाहती हैं और आत्मबल व मनोबल बढ़ाना चाहती हैं। लेकिन, कुछ मजबूरियों के कारण वह चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाती हैं। कारण या तो पति का सर्पोट नहीं मिलना या फिर पूंजी का अभाव रहना आदि होता है। माइका-माइंस एरिया के ढोढाकोला पंचायत के चक गाँव की एक ऐसी ही महत्वाकांक्षी महिला है मगदल्नी किण्डों। वे आगे बढ़ना तो चाहती हैं पर पूंजी नहीं रहने के कारण उनकी चाहत अधूरी थी। धीरे-धीरे उन्होंने बचत करना प्रारंभ किया। थोड़ा पूंजी हो गया। उन्होंने सोचा गांव में दुकान नहीं है सो छोटा-मोटा एक दूकान खोलेंगे। फिर, उन्होंने samarpan के आर्थिक मदद से गांव में ही एक छोटा-मोटा राशन दुकान खोली । दिनभर वह या ढिबरा चुनने जंगल जाती थी, ठीकेदारों के हाथों शोषण होता था या यूं ही दिन भर बैठकर समय गुजारती थी से मुक्ति मिल गयी। जितना पैसा ढिबरा में कमाती थी, उतना या उससे कहीं ज्यादा पैसा आज अपनी दुकान से कमा रही है। वह अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दुकान में लगा रही है तो कुछ हिस्सा से घर चला रही है। इससे उनके पति भी खुश  हैं और गांव वाले भी। क्योंकि, अब छोटा-मोटा चीज या समान के लिए ढोढाकोला नहीं जाना पड़ता है। गाँव में महिला के द्वारा दुकान चलाना अपने आप में एक बड़ी बात है। इससे उनकी पहचान गांव में अलग बन रही है।
चक गाँव जाने के लिए मात्र एक कच्ची सड़क है। यहां करीब 100 लोगों की एक छोटी सी बस्ती है। यहां एक भी दुकान नहीं है। ढोढाकोला के सप्ताहिक बाजार में ही लोग अपने दैनिक जरूरतों की खरीदारी करते थे। यदि किसी कारण समान खत्म हो जाय या फिर जरूरत पड़ जाय तो काफी फजीहत होती थी। यातायात के साधन एवं नेटर्वक न होने के कारण भी लोगों को परेशनियाँ होती थी। जिससे लोगों को आज निजाद मिल गया। खाने-पीन की चीजों से लेकर पाउडर, क्रीम, साग-सब्जी आदि सब गांव में ही उपलब्ध है। पसिया गांव जो 2 किमी की दूरी पर है। वहाँ से भी लोग आते है और अपने दैनिक समानों को इन्हीं के दुकान से खरीदकर ले जाते हैं। इस प्रक्रिया से आज न सिर्फ मगदल्नी किंडो खुश हैं बल्कि गांव के हर कोई खुश  हैं।
उत्तम कुमार


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